साहित्य

पूर्णिका

मंजुला शरण "मनु"

लक्ष्य पाने के लिए मन का प्रयास चाहिए।
साथ जो भी उसका विश्वास चाहिए।।

ऊँच- नीच जिन्दगी की है हर कड़ी।
जिन्दगी की राह के लिए प्रकाश चाहिए।।

मन की सारी उलझने होती हैं जटिल।
उलझनों से दूर मन का आकाश चाहिए।।

अपने और पराए की पहचान है कठिन।
बात और व्यवहार का जरा आभास चाहिए।।

आचरण हो शुद्ध और एकाग्र मन रहे।
इतनी साधना के लिए मन कैलाश चाहिए ।।

भेद-मतभेद की विडंबना है बड़ी।
एक ध्यान के लिए चिदाकाश चाहिए ।।

जल रहा है विश्व अहं की आग में।
विश्व के लिए ‘मनु’ मोहापाश चाहिए।।

मंजुला शरण “मनु”

राँची, झारखण्ड़।

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