
शिव शंकर ने पिया हलाहल, जग की पीर मिटाने को
हमने पिया है गरल गमों का, हर संबंध बचाने को॥
जटा में धारी गंग की धारा,कहीं प्रलय ना आ जाए
हम रोकें मनोभाव के विप्लव,प्रीत की रीत निभाने को ॥
धारण कीन्हा चंद्र शीश , विष तपन घटे मिले शीतलता
हम दिन रैन ही करते चिंतन, जीवित चिता सजाने को ॥
नीलकंठ कहलाए भोले, जीवन सब का संवारा है,
हम पीते कटु वचनों को बस,यूं ही सबको दिखाने को ॥
डमरू धारी का डमरू बजे, जन चेतना जग में जाग उठे,
हम झूठी तालियाँ बजाएँ, बस संसार रिझाने को॥
विनीता चौरासिया
शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश




