
अग्नि-लपट में जन्मी कथा, समय सुनाता आज,
अहंकारों की हार है, भक्ति का है राज।
सत्ता जब अंधी हुई, टूटे सारे मर्म,
बालक के विश्वास ने, रख दी नई धर्म की नींव।
होलिका थी ज्ञानमयी, साहस जिसकी शान,
पर भ्राता के मोह में, डगमगाया ध्यान।
एक तरफ था स्नेह भी, भतीजे का विश्वास,
एक तरफ था रक्त-संबंध, राजसत्ता का त्रास।
मन में उठते द्वंद्व थे, आँखों में संताप,
कर्तव्य और करुणा का चलता रहा प्रताप।
वस्त्र अग्नि से रक्षण का, पाया था वरदान,
पर भीतर की सत्यता, कर रही थी पहचान।
प्रह्लाद अडिग खड़ा रहा, जपता हरि का नाम,
भय की आँधी हार गई, जीता पावन धाम।
जली देह होलिका की, बचा भक्ति का बीज,
अधर्मों की राख पर, उगा सत्य का तीज।
होली की हर ज्वाला में, छिपा यही संदेश,
अहंकार जल जाएगा, जीतेगा सद्देश।
रंगों में जो प्रेम है, वही असली जीत,
मानवता की राह पर, चलना सबसे प्रीत।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




