साहित्य

आनंदवर्धक छंद

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

जान लो तुम इस हृदय की कामना।
पढ़ सदा लो शब्द उपजी भावना।।
हाथ जोड़े मैं करूँ यह याचना।
नैन को दर्शन दिखाओ साजना।।

मन भले ही है फंँसा जंजाल में।
ध्यान में पर हो तुम्ही हर हाल में।।
राह तेरी मैं तकूँ प्रतिपल सदा।
हर समस्या का बने तुम हल सदा।।

रात दिन आँसू नयन से हैं बहे।
दर्द जो भी मिल रहा उसको सहे।।
मन व्यथित हो अनमना हर क्षण रहे।
प्रीति की हर रीति को किससे कहे।।

जिंदगी की सांँस तुमसे ही चले।
प्रीत के शुचि भाव उसमें नित पले।।
साज हर श्रृंगार तुमसे ही बना।
आ मिलो प्रिय अब नहीं करना मना।।

एक ही वादा किए तुम मास का।
तोड़ दिल है पर दिया विश्वास का।।
क्यों किया ऐसा जरा आकर बता।
तुम छिपे बैठे कहांँ भेजो पता।।

बात कर स्वीकार लो मत टालना।
कर रही इस हेतु मैं जप साधना।।
तुम कभी उर मम निराशा मत भरो।
कृष्ण प्यारे आस यह पूरण करो।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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