हिंदी साहित्य का इतिहास- रीतिकाल की प्रवृत्तियाँ विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी सम्पन्न

वागीश्वरी काव्य निर्झरीणी, प्रयागराज (उ.प्र.) के तत्वावधान में 21 फरवरी 2026, शनिवार को सायं 08:15 बजे से रात्रि 10 बजे तक 13वीं राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी (ऑनलाइन) का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इसमें “हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल की प्रवृत्तियाँ)” विषय पर चुनिंदा वक्ताओं ने विशद व्याख्यान प्रस्तुत किया तथा उपस्थित सुधी साहित्य-साधकों द्वारा चर्चा-परिचर्चा किया गया। इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न भागों से साहित्यप्रेमियों एवं विद्वानों की सहभागिता रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ आदरणीया नेहा शर्मा द्वारा मधुर एवं भावपूर्ण सरस्वती वंदना से हुआ, जिससे वातावरण भक्तिमय एवं साहित्यिक हो उठा। तत्पश्चात् संस्था की सलाहकार आदरणीया क्षमा पाण्डेय ने अपने स्वागत-उद्बोधन के द्वारा सभी अतिथियों, वक्ताओं, श्रोताओं तथा संचालक मंडल के सदस्यों का स्वागत किया।

कार्यक्रम का संचालन महासचिव आदरणीय इ० हरिश कुमार सिंह भदौरीया जी ने प्रभावशाली तथा काव्यात्मक शैली में कुशलतापुर्वक किया। आ. भदौरिया ने कार्यक्रम की विशिष्टता, विविधता तथा आवश्यकता के बारे में बताया। प्रथम वक्ता आदरणीया सोनाली अवसरमोल ने रीतिकाल के नामकरण तथा उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने रीतिकाल की विशेषताओं को सरल, सहज एवं स्पष्ट शैली में प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् द्वितीय वक्ता आदरणीया प्रिया गुप्ता ने रीतिकाल की प्रमुख प्राविधियों का विश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने विषय की गहनता को बहुत बारीकी से संगोष्ठी में सभी के सामने प्रस्तुतिकरण किया। इसके बाद दर्शक दीर्घा में उपस्थित साहित्य-साधकगण आ. बृजेश आनंद राय, आ. इंदु सिंह कंचन, आ. रेनू शर्मा, आ. मेघा अग्रवाल, आ. रीना गुप्ता, आ. संजय गुप्ता व
आ. विशाल जैन पवा ने कार्यक्रम तथा विषय पर अपने विचार रखे।

तत्पश्चात् आयोजक संस्था/ समूह “वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी” के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ने कार्यक्रम का समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। हिन्दी साहित्य के इतिहास में रीतिकालीन साहित्य की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए इस काल के कवियों की कतिपय रचनाओं के बारे में बताया तथा इस कालखण्ड की ऐतिहासिक व सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। आपने देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता व विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में आचार्य नाम चंद्र शुक्ल, डॉ ग्रियर्सन, मिश्रबंधुओं, डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेंगर सिंह इत्यादि विद्वानों के योगदान के बारे में बताया। उन्होंने विशेष रूप से रीतिकालीन कवियों की विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए बताया कि रीतिकाल में श्रृंगार, अलंकार, छंद, मुक्तक तथ काव्य-सौंदर्य की प्रधानता रही, जिसने हिंदी काव्य को एक विशिष्ट पहचान तथा गौरव प्रदान किया।
अंत में व्यवस्थापक आदरणीय दुर्गादत्ता मिश्र ‘बाबा’ ने संगोष्ठी में उपस्थित सभी वक्ताओं तथा श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने सभी वक्ताओं, अतिथियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सफलता का श्रेय सभी सहभागियों को दिया। अंत में डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ने कार्यक्रम की औपचारिक समाप्ति की घोषणा की। इस प्रकार यह आभासी संगोष्ठी ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक एवं साहित्य-संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुई। कार्यक्रम ने हिंदी साहित्य के इतिहास को जानने के प्रति उत्कंठा व अनुराग को सुदृढ़ करने के साथ-साथ रीतिकाल की प्रवृत्तियों को समझने का एक सशक्त मंच प्रदान किया।
-डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
संस्थापक अध्यक्ष-वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी, प्रयागराज, उ०प्र०




