
श्रावण आया, शिव घर आए,
हर मन में विश्वास जगाया।
बोलो मिलकर “हर-हर शंभु”,
जग ने मंगल-गीत सुनाया॥
कण-कण में कैलास समाया,
नीलकंठ का रूप सुहाया।
गंगा बहती जटाओं से,
जग का सारा ताप मिटाया।
बेलपत्र की सरल अर्चना,
भक्ति का अनुपम उपहार।
श्रावण आया, शिव घर आए,
भर दो जीवन में संस्कार॥
डमरू की मधुरिम धुन बोले,
जागो मानव! सत्य ही तो ले।
त्रिशूल कहे अन्याय मिटाओ,
प्रेम-सुधा से जग को धो ले।
रुद्राक्षों की पावन माला,
दे संयम का दिव्य विचार।
श्रावण आया, शिव घर आए,
भर दो जीवन में संस्कार॥
कलम बने अब पूजा-थाली,
शब्द बनें गंगाजल प्यारे।
गीत बनें शिव-नाम की धारा,
सुर झरें बनकर उजियारे।
कविता केवल शब्द न हो अब,
बन जाए जन-जन का सार।
श्रावण आया, शिव घर आए,
भर दो जीवन में संस्कार॥
दंभ जले, अभिमान पिघल जाए,
मन में सेवा-भाव समाए।
जाति, धर्म की दीवारें टूटें,
मानव मानव से मिल जाए।
करुणा, दया, क्षमा की गंगा,
बहे सदा संसार अपार।
श्रावण आया, शिव घर आए,
भर दो जीवन में संस्कार॥
भारत फिर से विश्वगुरु हो,
ज्ञान-ज्योति हर ओर बहे।
ऋषियों की पावन परम्परा,
युग-युग तक अमरत्व कहे।
संस्कृति का ध्वज ऊँचा लहराए,
गूँजे वेदों का उद्गार।
श्रावण आया, शिव घर आए,
भर दो जीवन में संस्कार॥
हे भोले! इतना वर देना,
सत्य-पथों से न डिग पाएँ।
दुखियों के आँसू पोंछ सकें हम,
जीवन सफल बना जाएँ।
जन-जन के अंतर्मन में,
शिव-भक्ति का हो विस्तार।
श्रावण आया, शिव घर आए,
भर दो जीवन में संस्कार॥
श्रावण आया, शिव घर आए,
हर मन में विश्वास जगाया।
बोलो मिलकर “हर-हर शंभु”,
जग ने मंगल-गीत सुनाया॥
‘दिव्य’ यही प्रार्थना हमारी,
शिव-कृपा रहे अपरम्पार।
श्रावण आया, शिव घर आए,
भर दो जीवन में संस्कार॥
हर हर महादेव! 🔱🙏
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’




