साहित्य

खूब रोना चाहता हूं पर वक्त नहीं मिलता

डॉ रामशंकर चंचल

तंग आ चुका हूं
देश और दुनिया के राग द्वेष से
ऊँच नीच और सैकड़ों
बैराग आलाप रही दुनिया से
यह धरती हमारी है
यह भगवान हमारे है
अरे भाई लिखे पढ़े हो
की करते हो
धरती और भगवान
कभी किसी एक के नहीं होते हैं
सारी दुनिया की धरती है
सारी दुनिया के भगवान है
क्यों नहीं समझती यह दुनिया
सब को सब हक है
रहने का, खाने का
जीने का सुकून से
मानव मात्र पशु पक्षी सभी
ईश्वरीय संतान है,जिसने
हमें बनाया, उसने सभी को
बनाया है,क्यों भूल जाता है
सोचता हूं मेरे समझाने से
या मेरी जैसी कुछ और के
समझने से कूच नहीं होगा
पागल समझते हैं यह
स्वार्थी दुनिया
जो सर्फ अपना सुख सुकून
देखती है
खैर एक दिन
यह भगवान ही
उन्हें समझाएंगे
यह धरती माता ही
समझाइएगी
यह सोच कर
मानव मात्र के सुख सुकून की
कामना करते ईश्वर से
सो जाता हूं
देख रहे हूं
आँखों से
आँसू बह रहे हैं
शांत, चुपचाप
अविरल धारा में
मैं उन्हें बहने देता हूं
पता नहीं कब नींद आ गई
राम जाने
आई भी या नहीं
और सुबह हो गई
कुछ पता नहीं
बस जिंदा हूं
आज फ़िर सभी कुछ
रोज़ की तरह
जीते हुए
दुःखी हो
शायद यही जीवन है
जो ईश्वर ने मुझे
दिया है
प्रणाम उस परम् शक्ति ईश्वर को
जो मानव मात्र पशु पक्षी
सभी का मालिक है
पालनहार है
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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