
लिख भावना प्रधान,हो छंद का विधान।
जगदीश की पुकार,सुन कीजिये सुधार।।
गाते चले सुगीत,हो भाव भी प्रतीत।
गाता बसंत गीत,हो राग भी पुनीत।।
गाते बसंत राग,अब भिन्न-भिन्न फाग।
बहने लगीं तरंग,सब भाव से मतंग।।
हो राग में सुगंध,हो भाव सार बंध।
गाते रहे किशोर,हो भाव से विभोर।।
आगाज हो सुगीत,आधार भी पुनीत।
गाता बसंत गीत,हो भाव भी प्रतीत।।
श्रोता मिले महान, जय गूँजता जहान।
ताली बजे अनंत, जय घोष हो बसंत।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्ता
“जगदीश*
बनारस✍️✍️




