
भीड़ की इस गूँज से जब कट के तन्हा होती हूँ,
मौन के उस शून्य में मैं ख़ुद को गहरा बोती हूँ।
छंद, मात्रा, व्याकरण की बंदिशों से दूर हट,
देखती हूँ रूह पर जो चढ़ गई है धूल की परत।
पूछती हूँ— क्या ये मेरी ही चुनी हुई राह है?
या कि दुनिया की नज़र में सिर्फ़ एक वाह-वाह है?
जिम्मेदारियों की चादर जो तनी है जिस्म पर,
क्या बचा है अंश मेरा भी कहीं उस नाम पर?
मैंने संवरा है सभी को एक शिक्षक की तरह,
क्या कभी इस मन के भीतर को पढ़ाहै, पुस्तक की तरह।
वो जो आधे रह गए थे, उन सवालों का क्या हुआ?
मौन के इस मोड़ पर जो अनकहा ही रह गया।
अब न शब्दों का दिखावा, न कोई श्रृंगार हो,
मौन ही अब आत्म-साक्षात्कार का आधार हो।
तौलती हूँ ख़ुद को अपने ही तराजू पर खड़ी,
सत्य की ये खोज ही सबसे बड़ी है ये घड़ी।
ढूँढती हूँ वो सिरा जो अंतर्मन को जोड़ दे,
जो मुखौटे थक चुके हैं, आज उनको तोड़ दे।
अंततः मैं मौन होकर ख़ुद को सुनना चाहती हूँ,
मैं स्वयं के प्रश्नों से ही अपना उत्तर बुनना चाहती हूँ।
पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद


