✦ *मैं सोचता हूँ —*
कैसा है आज का यह मानव-संसार,
जहाँ लाश को छूकर वह स्नान करता है,
पर जीवित प्राणी को मारकर खाता है।
मेरी संवेदनाएँ मुझसे पूछती हैं—
क्या यही धर्म है? क्या यही दया है?
✦ *मैं देखता हूँ —*
यदि थाली में एक बाल आ जाए,
तो वह भोजन को त्याग देता है,
पर उसी थाली में “माँ का लाल” आ जाए,
तो स्वाद लेकर उसे खा जाता है।
मेरा हृदय तड़प उठता है—
सोचो! क्या हम इतने कठोर हो गए हैं?
✦ *मैं अनुभव करता हूँ —*
एक पत्थर मंदिर जाकर भगवान बन जाता है,
और इंसान…
हर दिन मंदिर जाकर भी
पत्थर ही बना रहता है।
मैं अपने शब्दों में उत्तर खोजता हूँ—
भक्ति कहाँ है? भावना कहाँ है?
✦ *मैं माँ को देखता हूँ —*
जो अपनी सुन्दरता मिटाकर बेटे को जीवन देती है,
और वही बेटा,
एक दिन अपनी पत्नी की सुन्दरता में
उसी माँ को ही भूल जाता है।
मेरा हृदय कह उठता है—
यह केवल विस्मृति नहीं,
यह संवेदनाओं की मृत्यु है।
✦ *जब मैं जीवन को समझता हूँ —*
तो पाता हूँ, हर कोई जीत चाहता है,
मैं भी जीत चाहता हूँ…
पर फूलों की दुकान पर जाकर
अनायास कह उठता हूँ—
“मुझे हार चाहिए…”
क्योंकि मैं जानता हूँ—
ईश्वर के सामने झुकना ही
सबसे बड़ी जीत है।
✦ *और तब…*
मेरा हृदय मुझसे कहता है—
यह कलयुग है,
जहाँ सत्य भी प्रश्न बन गया है,
और संवेदना भी संघर्ष बन गई है।
✦ *पर फिर भी…*
मैं आज भी आशा करता हूँ,
कि करुणा एक दिन अवश्य लौटेगी।
मुझे विश्वास है—
मानव फिर से मानव बनेगा,
और करुणा की गोद में
मानवता लौट आएगी।
✨*जब तक करुणा जीवित है,*
*मानवता पूरी तरह मरी नहीं है।* ✨
✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”




