
जीवन ही सृष्टि का आईना है
प्रकृति समतुल्य ना किया विचरण है
आंतरिक भाव, संताप रहित भय सागर बह जाते है ।
जीवन वो है जो कभी रुकता नहीं है जो हर वक़्त एक नई उम्मीदें की आस जगाये रखता हैं
आरंभ से आंत तक जीवन के मूल्यों जीता हैं ।
अंत-व्यथा, हर्ष वियोग,उल्लास
कर्म,श्रम जीवन के मूल्यों को समझा है
क्षणिक भर भी अभ्यास ना कर्तव्यों का ।
हम मानवता को जीवित रखे
सबसे करे सदैव मधुर व्यवहार
अधरों पर नाम हो ईश्वर का
इंसनियत और स्नेह का करते रहे संचार ।
जीवन की अर्थव्यवस्था बिखर गई है सबको दे अच्छी शिक्षा
सत्त्यता की धुरी से असत्यता की महत्ता को दूर करे ।
जीवन के मूल्यों को समझे
समयनिष्ठा का पालन करे
अच्छे कर्मों में लीन होकर
कर्तव्य -पथ सदैव रहे तैयार ।
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर-प्रदेश




