साहित्य

मुक्तक

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

राजा हो या रंक सभी, को एक दिन तो जाना होगा।
कालचक्र के क्रूर गाल में,इस जहांँ समाना होगा।
जन्म मरण का चक्र सदा से,यूंँ ही चलता आया है,
कर्म नेक कर ले तू बंदे, इसका फल खाना होगा।।

मुट्ठी बांँधे आया जग में, हाथ पसारे जायेगा।
इससे तो प्रभु भी नहीं बचे हैं, तू कैसे बच पाएगा।
आज बना तू जिसका हिस्सा, वह कल और किसी का है,
राष्ट्र हितैषी कर्म करो तुम, यशोगान जग गाएगा।।

परम चेतना की अनुकंपा,श्री यश धैर्य प्रतीक रही।
पुरुष संगिनी ये बनी हुई, जन्मदात्री शरीक रही।
समझो नारी को देह नहीं,अन्नपूर्णा होती सदा, अपना वजूद खो करके ये,प्रीति रीति की लीक रही।।

लाज से झुकते नयन से चितवने भी मंद है।
कामनाओं की नदी में सर्पिणी सी द्वंद है।
प्रेम की गंगा नहा कर, प्रीति साधक हो गयी,
धार मधुरस की पिया, तब मन खिला मकरंद है।।

जीवन की हर कठिन राह को, पल में सुगम बनाता।
ज्ञान वायु संचारित करके, ऊर का तमस मिटाता।
शुचि लक्ष्य प्राप्त हर शिष्य करें संकल्प यही होता है,
कर्म और पुरुषार्थ सिखाए शिक्षक भाग्य विधाता।।

कभी भूल से भी मत अपनी, क्षमताओं पर इतराना।
मधुर आपसी संबंधों से, जीवन खुशहाल बनाना।
लोहे को अपनी ताकत पर, होता देखा गर्व सदा,
लेकिन अग्नि उसे पिघलाती, मुश्किल सबको समझाना।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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