
मँय मजदूर अँव…………..
लालच अउ छल-कपट ले,मँय कोसो दूर हँव।
मंय मजदूर अँव…………..
घाम अउ पियास ले हावे,मोर खास मितानी।
मेहनत मा मजा आथे,जब तन ले चुहथे पानी।
मोर बर मयारू हे,सावन के करिया बादर हा।
जेखर सँग गिन्दरथे,बाँवत-बियासी नांगर हा।
सुत उठ के बड़े बिहनिया,खाथों टठिया भर बासी।
फेर नइ जानो भूख पियास,अउ नइ जानो थर्रासी।
जाँगर के टूटत ले करथव, हाथ आय काम ला।
मुहुँ फूटकार के नइ माँगव,मजदूरी के दाम ला।।
बांध,नाहर,पुलिया,सड़क मन,सब मोरेच बनाय ए।
कारखाना अउ खदान मा,खून-पसीना चुचवाय हे।
मँय धरती के सेवा करके,अन-पानी सिरजाथो।
जम्मो सुख सुविधा के,जिनिस ला घलो बनाथो।
तभो मंय हर जम्मो,सुख सुविधा ले दूर हँव।
मँय मज़दूर अँव…
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रचना:-जीवन चन्द्राकर”लाल”
बोरसी 52 दुर्ग (छत्तीसगढ़)



