साहित्य

आलेख-समीक्षा (भोजपुरी में)

लोक नाट्य शैली नौटंकी पर चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” जी के ई विचारात्मक आलेख लोक-संस्कृति के गहिर समझ बुझ के परिचायक बा। लेखक लोक-चेतना, लोक-अभिव्यक्ति आ लोक-अनुरंजन के आपसी संबंध के जमीनी धरातल पर रख के स्पष्ट कइले बानी। ई बात बहुत सटीक ढंग से सामने आवता कि लोक-विधा के सही मूल्यांकन बिना ओकर सामाजिक, ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जानल संभव नइखे।
नौटंकी के इतिहास, ओकर क्षेत्रीय परंपरा, आजादी के आंदोलन में ओकर भूमिका आ जनमानस पर पड़ल असर के लेखक बहुते आसान आ प्रवाहपूर्ण भाषा में बतावे क कोशिश कइले बानी। गद्य-पद्य के मिश्रित शैली, उर्दू-फारसी शब्दावली आ लोकभाषा के प्रयोग जवन नौटंकी के लोकप्रिय बनवलस, ओह पर लेखक के दृष्टि गहिर आ संतुलित लागेला।
आलेख के खास ताकत ई बा कि इ नौटंकी के खाली मनोरंजन के साधन ना मान के, लोक-दर्शन आ सामाजिक चेतना के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करेला। आज के समय में लोक-विधा के संरक्षण आ पुनर्जीवन के जरूरत पर लेखक के चिंता सार्थक आ समयोचित बा। कुल मिलाके ई मोनोग्राफ लोक-साहित्य आ लोक-नाट्य में रुचि रखे वाला पढनिहार खातिर एगो जरूरी दस्तावेज साबित होई।
लोक नाट्य पर एतना सारगर्भित, विचारोत्तेजक आ प्रेरक आलेख प्रस्तुत करे खातिर
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” जी के हृदय से धन्यवाद बा ।
आपके ई प्रयास लोक-संस्कृति के समझ आ संरक्षण में निश्चित रूप से मील का पत्थर साबित होई। 🙏

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