साहित्य

श्रमिक दिवस

सुनील कुमार खुराना

देखो हम धरा की तीन-तीन नारियां,
खेलें हम सदा ही जीवन की पारियां।
अपने जीवन की राहों में आगे खाई,
पीठ पीछे अपना बेटा कहते हैं माई।।

जिम्मेदारी का बोझ या ईंटों का भार,
अपने साथ से ही जीत में बदलें हार।
सुख-दुख में रहते हम सदा साथ हम,
भुजाओं पर नाज हमें करते हम श्रम।।

समझ कर नारियों से धरा पर जीवन,
लगन करें बात समझ जग में श्रीमन।
घर हो या बाहर छाया है अपना नाम,
राहों से कांटे चुन बढ़कर करते काम।।

बंजर भूमि में हम सदा फूल खिलाते,
मीत क्या हम दुश्मन को गलें लगाते।
कलयुग हो या सतयुग सब हमें पूजे,
इस धरा पर नारी-नारी ही नाम गूंजे।।

सुनील कुमार खुराना
नकुड़ सहारनपुर उत्तर प्रदेश भारत

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