आलेख

सभ्यता के वास्तविक शिल्पकार और श्रम की अंतहीन गाथा

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

मजदूर दिवस केवल एक तिथि विशेष का उत्सव या कैलेंडर का कोई लाल पन्ना मात्र नहीं है, बल्कि यह उस आदिम संघर्ष और आधुनिक संकल्प का पावन संगम है जिसने मानव इतिहास के हर कालखंड में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। जब हम सभ्यता के विकास क्रम पर दृष्टि डालते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि ऊँची अट्टालिकाओं के कंगूरों से लेकर समुद्र का सीना चीरकर बनाए गए विशाल सेतुओं तक, हर निर्माण की आत्मा में किसी श्रमिक का मौन बलिदान और उसकी मांसपेशियों का खिंचाव समाहित है। एक मजदूर का परिश्रम केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि वह पवित्र यज्ञ है जिसमें वह अपने जीवन की ऊर्जा को झोंककर समाज के लिए सुख-सुविधाओं का सृजन करता है। समाज अक्सर तैयार ढांचे की बाहरी सुंदरता और तकनीकी छलांग पर तो मोहित हो जाता है, लेकिन उस मटमैले चेहरे और धूल से सने व्यक्तित्व को विस्मृत कर देता है जिसने उस ढांचे को खड़ा करने के लिए कड़कती धूप की जलन और शारीरिक कष्टों को अपनी नियति मानकर स्वीकार किया है।
वास्तव में, मजदूर का पसीना वह ‘तरल सोना’ है जिससे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की चमक बरकरार रहती है, परंतु यह एक कटु विडंबना है कि जिस हाथ ने पूरी दुनिया के लिए महलों की नींव रखी, वह स्वयं अक्सर एक अदद छत और बुनियादी सुविधाओं के लिए ताउम्र संघर्ष करता रह जाता है। श्रम की इस दास्तान में केवल शारीरिक थकान ही नहीं, बल्कि वह अदम्य मानवीय जिजीविषा और मानसिक दृढ़ता भी शामिल है जो घोर अभावों के बीच भी सृजन का साहस बनाए रखती है। मशीनीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में भी मानवीय श्रम का कोई विकल्प नहीं हो सकता, क्योंकि मशीनें कार्य तो कुशलता से कर सकती हैं, लेकिन उनमें वह संवेदना, भावना और समर्पण नहीं हो सकता जो एक श्रमिक अपने काम के हर कतरे में पिरोता है। यह दिवस हमें उस ऐतिहासिक संघर्ष की भी स्मृति दिलाता है जब श्रमिकों ने अपने मानवाधिकारों और गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवाज बुलंद की थी, यह स्थापित करते हुए कि वे कोई निर्जीव पुर्जे नहीं बल्कि समाज की एक जीवंत और गौरवशाली इकाई हैं।
आज का यह विशेष संदर्भ हमें मजबूर करता है कि हम विकास की परिभाषा को केवल जीडीपी के निर्जीव आंकड़ों में न मापें, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर में आए सुधार से आंकें जिसकी मेहनत ने उन आंकड़ों को जन्म दिया है। समाज का यह नैतिक उत्तरदायित्व है कि वह श्रम को केवल ‘मजदूरी’ के संकुचित तराजू में न तौले, बल्कि उसे ‘सम्मान’ के ऊँचे सिंहासन पर बिठाए, क्योंकि जब तक पसीने की बूंदों का मूल्य केवल रुपयों में आंका जाएगा, तब तक सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी ही रहेगी। हमें एक ऐसे संवेदनशील तंत्र और वातावरण का निर्माण करना होगा जहाँ राष्ट्र के इन निर्माताओं को अपनी सुरक्षा, स्वास्थ्य और अपने बच्चों के भविष्य के लिए याचना न करनी पड़े, बल्कि सत्ता और समाज स्वयं आगे बढ़कर उनकी उंगलियों के पोरों में दबी हुई सभ्यता की कहानियों को सहेजने का प्रयास करें।
यह संपादकीय उन करोड़ों अज्ञात नायकों को समर्पित है जो इतिहास की किताबों के मुख्य पृष्ठों पर तो दर्ज नहीं होते, लेकिन जिनके बिना इतिहास का एक भी पन्ना लिखा जाना संभव नहीं है। अतः आज का यह दिन केवल औपचारिक अभिवादन या प्रशंसा का नहीं है, बल्कि यह समाज और सत्ता के विवेक को झकझोरने का क्षण है, ताकि हम निर्माण की प्रक्रिया में लगे इन हाथों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके अधिकारों की रक्षा का सामूहिक संकल्प ले सकें। आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि यह चमकती हुई आधुनिक दुनिया किसी चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि एक मजदूर के अडिग परिश्रम, उसके छालों की मूक दास्तान और उसके अमूल्य पसीने की स्याही से लिखी गई एक अमर गाथा है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!