
एक रोटी की आस में,
जीवन संघर्षों से लड़ते।
मासूम बच्चे,
बाल मजदूर बनते।
टुकुर टुकुर राह निहारे,
दो रोटी के लिए बाँह पसारे।
हाय रे!किस्मत,
रोटी के लिए हम भटक रहे।
घर बार छोड़कर भी,
रोटी रोटी करके हम तड़प रहे।
इससे तो अच्छा गाँव था,
यहाँ तो जीवन जीने के लिए तरस रहे।
हो गई रोजी रोटी,
मजबूरी इतनी कि,
चोरी चकारी ,हत्याएं,हमले,प्रपंच व
जेब काटने पर उतर रहे।
न रोजी मिली और न रोटी भीख मांगने से भी,
हम कहीं के नही रहे।
भूख रह गई थाली में,
एक रोटी की आस में।।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज



