साहित्य

मजदूर विवश है मजूदर दिवस को जिंदा रखने के लिए

डॉ रामशंकर चंचल

मजदूर दिवस
अहसास मजदूर
बेचारा क्या करें
क्यों कि कोई नहीं चाहता
मजदूर, मजबूर न हो
अगर वह नहीं रहा तो
क्या होगा
सपन्न लोगो के
अहम का , उनके सुख सुकून का
इसलिए अक्सर लोग यही चाहते है
मजदूर, मजदूर रहे
तभी तो असहाय सा
मजदूर सदियों से जिंदा है
धरती पर
उन अहम में जीते
बड़े होने की बू पाले
लोगो के लिए
उनके सुख सुकून के लिए
मजदूर दिवस पर
अपनी फोटो सहित
कविता और कथाओं लिख
बड़े समझ ने वाले
अपने अहम की
गुड्डूगी बजाते हुए
जीते लोगो का क्या होगा
मजदूर दिवस पर दस्तक देते
मजदूर अंकों का
क्या होगा
बेचारा मजदूर कितना कुछ
सोचता हूं इन
बड़े समझ बैठे लोगों के लिए
पर ये बड़े नहीं समझते ये कि
वह मजदूर ही है जो
सदियों से धरती पर
हर मौसम में
लड़ता हुआ अर्धनग्न
मानव मात्र का पेट भरने में
अनाज पैदा करने में
लगा रहता है और
कुछ अपने साल भर के लिए
सुरक्षित रखते हुए
अन्य सस्ते दामों में
सरकार को बेच देता है
सरकार जैसे ख़ुद अनाज पैदा कर
सभी को बांट रही हो
इस तरह इतराती
सभी को कम मूल्य में
अनाज का ताजा पहने
बांट देती
सच, सच है
मजदूर सदियों से धरती पर
अहम में जीते लोगो का
अहम जिंदा रखें हैं
खैर साहब, ज्यादा लिखूंगा तो
मजूदर दिवस पर दस्तक देती
इस सार्थक अद्भुत सत्य कविता
को संपादक महोदय
नहीं देगे
या अहम में जीते लोग
मुझे पागल समझ लेंगे
क्यों कि सत्य सदा ही
बहुत कड़वा होता हैं
ऐसा चुभ जाते है कि
इन बड़े समझ रहे
लोगो को रात भर सोने नहीं देता
वो सदा की तरह
सुख और सुकून से जीते रहे
उनकी खुशी के लिए
में भी जन्म से
मजूदर दिवस पर
कविता लिख देता हूं
ताकि लोगों को लगे
में कितना बड़ा हूं
क्या अद्भुत कविता लिखी
क्या करूं, कुछ नहीं कर सकता
जब देश और दुनिया के
संपन्न बड़े बड़े लोग
आज तक कुछ नहीं कर सके
तो नाचीज़ फकीर क्या करेगा
प्रणाम करता हूं
इन ईश्वर रूप
मजदूर दिवस को
सभी मजदूरों को सतत्
प्रणाम जो सदियों से धरती पर
जिंदा रखें हैं मानव मात्र पशु पक्षी सभी प्राणियों को
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!