साहित्य

श्रमिक

श्रीमती विनोद शर्मा

हे कर्म निष्ठा के पथिक!
नमन है तुम को श्रमिक।।

तुम सृजन के शिल्पी ठहरे,
कौन तुम को रोक पाये ?
वन्हि-ज्वाला, सिंधु-लहरें,
कौन बाधा तुम्हें हराये?
कब रुके हो, कब झुके हो?
सम्मुख कोई विपदा आये।।

तप्त हो धरती का सीना,
अगन बरसाता रवि हो।
श्रमिक का बहता पसीना
मात सबको दे रहा हो।
हर चुनौति से लड़े हो ,
आत्म दृढ़ ज्योति जगाये।

टूटतीं पर्वत शिलाएं,
खेत सारे लहलहाएं।
तेरे श्रम-संकल्प सम्मुख
उत्खनित भू-सम्पदाएं ।
साधना पथ पर चले हो,
निज साध्य पर दृष्टि जमाये।।

श्रीमती विनोद शर्मा
रानीबाग, धामपुर
जिला-बिजनौर
उत्तर-प्रदेश

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