
श्रम ही जीवन
श्रम ही यौवन
जन-जन का हो ऐसा दर्शन।
बिना परिश्रम के,
कुछ खाना ,
चोरी का खाना कहलाता ;
सदा सत्य है” गांधी दर्शन”।
कर्म ओ श्रम का रूप एक है-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते ”
जाना माना गीता- दर्शन ।
सफल संपदाएं धरती की
आतीं केवल पास उसी के
जिसने जाना “श्रमैव जयते”
भारत का कण- कण कहता है,
कर्म करो, कुछ कर्म करो,
कर्म बिना निष्क्रिय जीवन।
सीखो उस बेजुबान पक्षी से,
तिनका- तिनका चुन चुन कर
नीड़ बना करता सुख- अर्जन।
स्वरचित- डॉ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद. उत्तर प्रदेश ।




