साहित्य

मजदूर दिवस

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

हम सब तो मजदूर ही हैं,फिर क्यूं कर इसे मनाते,
एक दूजे की हम करें प्रशंसा, स्नेह सहज अपनाते,
श्रम करने की अवधि हो निश्चित, बलात् नहीं कुछ करवाएं,
बीबी,बच्चों,घर हेतु भी तो कर्तव्य सभी निभाते।।

उन्नीस सौ छियासी एक मई, आठ घंटे का समय हुआ निर्धारित
शिकागो के महाधिवेशन में दिवस मनाने को हुआ प्रचारित
काम के बदले धन का उपार्जन,इस नियम तहत ही होता,
लेबल ला है बना इसी से,हर जगह सही से प्रसारित।।

बहुत लड़ाई लड़नी पड़तीं, मजदूरों को मालिक सम्मुख,
पर भूल रहे,वे भी हैं श्रमिक,किसी अन्य विशेष मालिक सम्मुख,
अपने को सुपर साबित करने में,बीभत्स्य दृश्य भी दिखते,
हक अपना जब भी मांगे कोई, मालिक अकड़ के आता सम्मुख।।

आखिर कब तक,बर्दाश्त करे शोषण,शोषित इन कतिपय आकाओं से,
जिस डाल के पत्ते तने जड़ें सब खुद नोंचे पर पानी फेरते श्रमिक आशाओं पे
आगाह करें और चेताते भी श्रमिक बंधु इन मालिक,महा विधाता सा,
खून पसीना जो बहा रहा,नेक नियत से समृद्धि हेतु अधिष्ठानों में।।

बेकद्री करनी कभी न चहिए इन श्रमिको की आकाओं को,
यही मूल हैं,यही रीढ हैं,यही बनाते और सजाते अपने इन महाराजों को,
अपना खून चुसा करके,इनकी कोठी कुलबा सभी बनाते,
खुद रहें झोपड़ी में मजदूर सभी पर आसमां पे बिठाते राजाओं को।।

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

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