साहित्य

रातें गुजार दी

डॉ रामशंकर चंचल 

जिंदगी भी, अजीब अजीब दी है उस ऊपर वाले ने , मुझे याद नहीं होश में आने के बाद अर्थात उम्र के 17 या 18 साल में ही रात की नीरवता , शांत सुख सुकून का अहसास होने लगा था , जब सब सो जाते में अकेला पढ़ता था और सोचा करता था, सब क्यों सो गए और में क्यों नहीं सो पाया आदि आदि विचार कर जीत रहा

क्या पता था जिंदगी इसी तरह व्यतीत करना होगी बचपन से इतना संवेदनशील भावुकता बना दिया था कि हर व्यक्ति का दुःख खुद महसूस करते हुए दुःखी हो जाता था जबकि यहां तो करोड़ों लोग ऐसे हैं कि उनके दुःख भी मुझे दुःखी कर जाते है और उन्हें उससे कोई लेना देना नहीं बस जी रहे हैं जैसी जिंदगी ईश्वर ने दी फिर सोचता हूं सही है वे लोग सोचने से क्या होगा बेहतर है सो जाय सब कुछ भूल कर कल फिर इसी तरह जीना है, सुख सुकून उन्हें नसीब है जो पहले से सुखी है, सम्पन्न है, वहीं तो सुख की कल्पना कर सकते है और हासिल भी

 

खैर सब कुछ जानते हुए भी अक्सर में और के दुःख को समेटे लिख कर राहत महसूस करता हुआ जीता रहा और जी रहा हूं इतनी उम्र निकाल दी यही सब कुछ करते हुए इतना आदि हो गया कि अब मैने भी उनकी तरह सोचना शुरू कर दिया शायद यही जिंदगी लिखी है ऊपर वाले ने बस यह सोच सुख सुकून महसूस करता हुआ सालों से सतत् सृजन शील जी रहा हूं बिना कोई चाह, न इच्छा इसी को जीवन मान लिया और जीने लगा , रोज़ रोज़ सालों से बेहिसाब दर्द समेटे हुए अपने तो कभी और के , सोच हैरान हो जाता हूं आज भी कभी कभी कि एक रात जाग जाने वाले करोड़ों को देखा इस कदर उस रात का बयान करते हैं कि,कल रात भर नींद नहीं आई परेशान रहा और फिर अन्य सुनने वाले उन्हें सैकड़ों इलाज बताते हुए कहने लगते है, ऐसा करा करो वैसा करा करो

नींद तो रात को आना चाहिए रात बनी है नींद के लिए , ये अक्सर वो लोग होते है जो नहीं जानते हैं कि आज भी करोड़ों लोग मजदूर आदि आदि सैकड़ों लोग पूरी रात जाग कर घर परिवार चलाते हैं तो कुछ देश और दुनिया को बहुत बहुत कुछ सुख सुकून बांट कर सुखद महसूस करते हैं

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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