
शहरों की अंधी दौड़ से जब
थककर चूर होते हैं,
तब इन अडिग पहाड़ों के हम
थोड़े करीब होते हैं।
ये वीर वन,ये ऊंचे शिखर जो
सदियों से मौन खड़े हैं,
इनमें क्या कोई शून्य है नहीं,
ब्रह्मांड के राग बड़े हैं।
सहलाकर पेड़ों की पत्तियों को
जब दर्द समझ आता है,
तब भीतर सोया हुआ इंसान और
एक कवि जाग जाता है।
कविता
पत्थरों का गीत
डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’ (हरदा, मध्य प्रदेश)
पहाड़ों का सीना चीरकर जो
चश्मे बाहर आते हैं,
वे पानी का बहाव नहीं, धरती
की धड़कन बन जाते हैं।
जब टकराते हैं राहों में वो निष्ठुर,
कठोर पत्थरों से,
तो प्रलय नहीं, संगीत जन्म लेता है
उन पावन लहरों से।
गुनगुनाकर नदियाँ कहती हैं,
बाधाओं से डरना क्या,
रास्ता बनाकर चलते रहना
ही जीवन है, ठहरना क्या!




