साहित्य

परिवार

विनीता चौरासिया

जिस परिवार में हमने अपने, सारे सुख-दुख बाँटे हैं,

खाते मिलकर भोग-मिठाई, और सभी फल बाँटे हैं।

दिल का सूना कोना अब भी, उन यादों में डूबा है,

जहाँ भाई-बहन ने रबड़-पेंसिल, भी काट कर बाँटे हैं।

 

कभी पड़ोसी, किराएदार भी, सब परिवार-से लगते थे,

साथ-साथ हम हँसते-गाते, लड़ते और झगड़ते थे।

पड़ोस में मुनिया की नानी, पैसे और पेड़े दे जातीं,

उसने तो वो भी आकर, हम भाई-बहन में बाँटे हैं।

 

जाने कब और क्यों, कैसे, रिश्तों के मायने बदल गए,

रफ्ता-रफ्ता कब हम, एक-दूजे के दिल से फिसल गए।

गली-मोहल्ले की ताई, चाची, भी माँ-सी लगती थीं,

अब तो अपने मात-पिता ही भाई-बहन ने बाँटे हैं।

 

छत से छत पर कूद-कूद कर, पूरा मोहल्ला नापा था,

एक-एक बंदे के नेह को, अपने हृदय में छापा था।

रूठना और मनाना, परिवार में दोनों होते थे,

अब भूल मनाना, रूठा-रूठी,ने परिवार ही बाँटे हैं।

 

विनीता चौरासिया शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश

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