
कैसा है ये मन का दर्पण,
पता नहीं क्या कहता रहता
खुली क़िताब क़लम को लेकर,सपने सदा लिखता ही रहता ।
खोए सपने और ख़्वाब हैं सुहाने,
सब कुछ चुपचाप वो सहता रहता ।
पंख लगाकर मीठे पंछी स्वर में,
गीत नए हैं ये सुनाता रहता
मन की एक प्यारी मुस्कान सुहानी,
साथ हमेशा जिसे लेकर चलता रहता ।
कैसा है ये मन का दर्पण,
पता नहीं क्या कहता रहता ।
ख़्वाबों की धुंधली परछाईं में ये,
सुंदर नए हैं स्वप्न दिखाता रहता।
नहीं ठिकाना कोई पल में इसका,
आता जाता यह हरदम रहता
मेघों के संग नीले आसमान में,
सपने नए रोज़ बुनता हैं रहता
बिखर गए जो मन के सपने,
उनका ही लेखा-जोखा करता रहता।
-डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




