साहित्य

हक़ीक़त-ए-दिल

डॉ, दक्षा

लिखता है वो, आसमां लिखता है,

हक़ीक़त-ए-दिल मग़र कोई कहाँ लिखता है?

​जो गुज़रती है रूह पर, वो छुपा लेता है,

काग़ज़ों पर तो बस वो दास्ताँ लिखता है।

​दिखावे की महफ़िल में मशग़ूल है दुनिया,

ज़ख़्म गहरे हैं जो, उसे धुआँ लिखता है।

​बोली लगती है यहाँ हर एक जज़्बात की,

सच्ची मोहब्बत को भी वो दुकां लिखता है।

​होठों पे सन्नाटा, आँखों में समंदर है,

ख़ामोशी को अपनी वो ज़बाँ लिखता है।

​ढूंढता है शिफ़ा जो बाहर के जहान में,

भीतर के मरुस्थल को वो कारवां लिखता है।

​मिटाकर ‘मैं’ को जो रूह से जुड़ जाए,

वही परिंदा ख़ुद को खुला आसमां लिखता है।

 

-डॉ, दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद,गुजरात।

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