
महिमा का क्या करूँ गान,
जो भी उच्चारती, सब हैं अल्प मान।
1- पिता एक उम्मीद है, एक आस है,
परिवार की हिम्मत और विश्वास है,
बाहर से सख्त अंदर से कोमल और दृढ़ है।
उसके दिल में जज़्ब हैं ज़िन्दगी के कई मर्म और भेद।
पिता संघर्ष की आँधियों में हौसलों की दीवार है।
2- वह परेशानियों से लड़ने को दो धारी तलवार है,
बचपन में खुश करने वाले खिलौनों का संस्पर्श है।
नींद आने पर बन जाता नर्म बिछौना हैं।
3- पिता उत्तरदायित्व से भरी गाड़ी के सारथी हैं, सबको बराबर का हक़ दिलाने वाले यही एक महारथी हैं।
सपनों को पूरा करने में साहस का अद्भुत नमूना भी तो हैं।
4- उन्हीं से तो माँ और बच्चों की घर बाहर पहचान है।
पिता ज़मीर है, ऐसी जागीर हैं, जिसके पास ये है वह सबसे अमीर है।
5- कहने को सब ऊपर वाला देता है,पर मिलने का ज़रिया तो पिता है।
क्या कुछ कहूँ, बूझ न पाऊँ,
बस- परमपिता का ही स्वरूप तो पिता है।।
रचयिता- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक विचार, ©® रुद्रपुर, उत्तराखंड।




