साहित्य

पापा की अनमोल घड़ी

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

दीवार पर टंगी एक पुरानी घड़ी,

पर मेरे लिए वो बस घड़ी नहीं।

उसमें छिपी हैं यादें अनगिनत,

पापा की सीखें, बातें सभी।

 

हर टिक-टिक जैसे कहती रहती,

समय कभी वापस आता नहीं।

मेहनत, सच्चाई और अनुशासन,

इनसे बढ़कर कुछ होता नहीं।

 

जब भी जीवन में मैं ठहर जाती,

उस घड़ी की आवाज़ सुनाई देती—

“चलते रहो, मत हारो कभी,

मंज़िल मेहनत से ही मिलती।”

 

पापा ने जिस दिन उसे सजाया,

घर में जैसे विश्वास बसाया।

आज भी उसकी हर धड़कन में,

उनका स्नेह मुस्काता पाया।

 

वो घड़ी अनमोल इसलिए है,

क्योंकि उसमें समय नहीं बसता,

उसमें पापा का प्यार धड़कता है,

जो हर पल मेरे साथ रहता।

 

स्वरचित/मौलिक

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़

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