
हर सुबह बड़े प्यार से उन्हें तैयार करते हैं,
माथे को चूमकर कहते हैं—
“जल्दी घर लौट आना बेटा।”
वे मुस्कुराते हुए घर से निकलते हैं,
कंधों पर किताबों का बोझ नहीं,
माँ-बाप के सपनों का संसार लेकर जाते हैं।
लेकिन अब हर विदाई डराने लगी है।
अब हर दरवाज़े के बंद होने पर
दिल काँपने लगता है।
हम अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं,
सपनों की उड़ान भरने भेजते हैं,
लेकिन कौन जानता था कि
कुछ रास्ते वापस घर नहीं लौटते।
एक माँ आज भी दरवाज़े पर खड़ी है,
उसकी आँखें अपने बच्चे को ढूँढ़ रही हैं।
एक पिता अब भी यही सोच रहा है—
“काश! उस दिन मैं उसे रोक लेता।”
बच्चों की हँसी से गूँजने वाली जगहें
जब चीखों और सन्नाटे में बदल जाएँ,
तो सिर्फ इमारतें नहीं जलतीं,
माँ-बाप के अरमान भी राख हो जाते हैं।
आज हर माँ, हर पिता, हर परिवार
एक ही सवाल पूछ रहा है—
आख़िर कहाँ सुरक्षित हैं हमारे बच्चे?
किसके भरोसे उन्हें घर से बाहर भेजें?
कहाँ सुरक्षित हैं मेरे बच्चे?
सीता सर्वेश त्रिवेदी शाहजहांपुर




