साहित्य समाचार

प्रेम के अंतराल :: वर्तमान पीढ़ी पर अति महत्वपूर्ण उपन्यास 

रविशंकर शुक्ल 

उत्तर प्रदेश के पूर्व राजपत्रित अधिकारी एवं वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत के यशस्वी व महत्वपूर्ण रचनाकार श्री अमित कुमार मल्ल की लेखनी ने तो सन 1983 से ही अपना हस्ताक्षर आरंभ कर दिया था वह भी साप्ताहिक हिंदुस्तान के साथ तब से उनकी लेखनी ने निरंतर प्रवाहमान रहते हुए काव्य संग्रह, कहानी संग्रह और लोक कथा संग्रह के रूप में कई एक विशिष्ट पुस्तक हिन्दी साहित्य को प्रदान किया है।

उनका सृजन के प्रति समर्पण निश्चित ही प्रशंसनीय है ।मल्ल जी हमारे पड़ोसी हैं और मेरा या उनका बचपन कुछ समयांतराल के बीच गांव -जवार के लगभग एक जैसे वातावरण में ही बीता है।

खैर अब अगले प्रसंग पर आता हूं।

हाल ही में पिछले साल उनका उपन्यास बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुआ है। इसका नाम “समय के अंतराल ” है और आज के युवा पीढ़ी पर आधारित है।

यहां एक बात ध्यातव्य है कि बोधि प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकें कुछ ना कुछ वैशिष्ट्य लिए अवश्य होती हैं ऐसा मैंने महसूस किया है।

“प्रेम के अंतराल” उपन्यास की कथा के आरंभिक दौर में एक युवक रेवाड़ी के एक सामान्य शहर से निकल कर दिल्ली के आबो हवा में प्रवेश करता है। उसका नाम अर्जुन है,आई आई टी, दिल्ली में उसका स्वागत, वेलकम फ्रैशर्स के रूप में होता है।

उसी दौरान उसकी मुलाकात मुंबई से आई एक मायरा नामक लड़की से होती है जो एक संभ्रांत परिवार से ताल्लुक रखती है और जिसका पिछला समय भारत के सबसे अत्याधुनिक शहर में व्यतीत हुआ है,वहीं से पली,बढ़ी और पढ़ी है।

टेक्नोलॉजिकल इन्श्चिच्यूट का जीवन कुछ बनने और कुछ कर गुजरने का वातावरण। भिन्न-भिन्न क्लबों , उनके कार्यक्रम के साथ -साथ मारिया और अर्जुन एक दूसरे के नजदीक आते जाते हैं और स्वाभाविक है कि उनके बीच आकर्षण और प्रेम के अंकुर पनपने लगते हैं।

उपन्यासकार ने आज के युवा वर्ग की मन: स्थिति का इतनी कुशलता के संग चित्रण किया है कि लगता ही नहीं वास्तविक जीवन से अलग हम किसी कथानक को पढ़ रहे हैं।

आई आई टी का समय 2017 से 2020 तक पढ़ते -लिखते, बोलते -बतियाते,कनाट प्लेस और हौज खास का चक्कर लगाने में कब बीत गया उन्हें पता भी नहीं चला और अब उन्हें कैंपस सेलेक्शन और सेटिलमेंट की चिंता और आशंकाएं परेशान कर रही हैं। इसके पहले से ही दोनों ने हास्टल छोड़कर एक साथ रहना शुरू कर दिया था।

कार्य क्षेत्र की दूरियां और उससे होने वाली दैनंदिन परेशानियों का काबिले तारीफ मनोविश्लेषण उपन्यासकार ने किया है जो वर्तमान से कदम ताल करता हुआ आगे बढ़ता है इसके लिए निश्चित ही वह बधाई के हकदार हैं।

अर्जुन बैंगलोर शिफ्ट हो जाता है।मायरा अपना स्टार्ट अप गुरुग्राम में आरंभ कर चुकी थी। इस बीच इन दोनों के जीवन में विसंगतियों ने आशंकाओं के संग धीरे धीरे प्रवेश किया। स्थितियां सालों साल कठिनतर होती गयीं तो दोनों ने ब्रेक अप का निर्णय लिया।

यद्यपि दोनों ने मिलकर निर्णय लिया था पर यह भी वास्तविकता हैं कि दोनों के बीच जो पहले प्यार के बीज अंकुरित हो चुके थे वह कभी भी अन्तर्मन से खत्म होने का नाम नहीं लिये, हालांकि इसके लिए दोनों ने ही अपने अन्तर्मन की सीमा लांघ कर दिल को बहलाने की कई एक पुरजोर कोशिश भी किया।

अर्जुन और मायरा ने अगले दो-तीन साल इसी कशमकश में गुजार दिए। दोनों एक दूसरे को भूल नहीं पा रहे थे, इस बीच संयोगवश हुए उनके अंतिम मुलाकात ने उनके जीवन को एक नई और बेहतरीन दिशा की तरफ बढ़ने को तत्पर किया।

दोनों मुंबई में आपस मे मिले फिर से संग साथ रहने की उम्मीद के साथ और अपने रोजमर्रा के क्रिया कलापों में मानसिक सामंजस्य बिठाते हुए आगे बढ़ते रहे। अर्जुन ने प्रयास करके स्वयं को गुरूग्राम शिफ्ट कर लिया और मायरा और अर्जुन संग -साथ रहने लगे।

यह एक लघु उपन्यास है पर इसके संदेश बहुत बड़े हैं।

अंत में मैं अपनी बात इसी उपन्यास के कुछ अंतिम पंक्तियों के संग समाप्त करता हूं।

“2025 की शुरुआत तक अर्जुन और मायरा ने अपनी जिंदगी में एक बैलेंस बना लिया था।वे अब एक ही फ्लैट में रहते थे, एक दूसरे की जिंदगी का हिस्सा थे। उनकी जिंदगी में अब भी चुनौतियां थीं –काम का प्रेशर, छोटी –मोटी तकरार, और कभी कभी अतीत की यादें। लेकिन इस बार, उन्होंने एक दूसरे को नहीं छोड़ा।”

अमित कुमार मल्ल जी को इस अति महत्वपूर्ण उपन्यास के सृजन हेतु आत्मीय बधाई और शुभकामनाएं।

 

रविशंकर शुक्ल

कृष्णायन, एम-2/67,

जवाहर विहार कालोनी,

रायबरेली -229010

मोबाइल फोन नंबर

8707020053,

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