
गूँजते हो तुम निरंतर,
इस प्रकंपित मनन में,
जैसे कोई मंत्र सात्त्विक, गूँजता हो त्रिभुवन में।
ध्वनि अनाहत की जगाकर, मौन को वाणी मिली,
जो छिपी थी चेतना में,
वह कली पावन खिली ।
रश्मि बन तुम आ गए जब, तिमिर का हुआ अवसान ,
खोजती जो सूक्ष्मता को,
सिर्फ़ है वह तुम्हारी तान ।
तुम न केवल एक सुधि हो, तुम परम विश्राम हो,
जगत के इस मरुस्थल में, सुरभित सावन श्याम हो ।
क्या विरह और क्या मिलन है, भेद सब ही मिट गया,
चित्त का जो द्वंद्व था वह, शांत होकर स्थिर भया।
प्रश्न जो बनकर उठे थे,
बन गए उत्तर स्वयं,
राग-विराग के इस छोर पर, आ गया अद्भुत संयम।
गूँज बनकर तुम समाए,
बूँद में सागर यथा,
कह रही मौन संवेदना,
इस प्रेम की पावन कथा ।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात




