
रंग नहीं कोई पानी का
रूप नहीं कोई पानी का ।
अनमोल मोल पानी का ।
कट रहे रोज वन -जंगल,
पर्यावरण का हुआ अमंगल !
कंक्रीटों के बढ़े बाजार ,
खुली हवा का हुआ व्यापार ।
बदल गए शहर के चेहरे ,
हुए सब शतरंज के मोहरे ।
मानव श्रम बंट गए मशीनों में,
अपशिष्ट बहे नदियों में।
पर्यावरण हो रहा दूषित ,
कैसे होगी धरती सुरक्षित?
धुएं, धूल और शोर शराबा
बीमार हो रहा है पर्यावरण।
चोर ले गए कितने चंदन- वन।
बीमार दिखते अब वन ।
ऐसा ना हो आने वाली पीढ़ी
तस्वीरों से ही जाने
पेड़,पर्वत जंगल-वन ।
चलो आज सब मिल कर
करें पर्यावरण का संरक्षण।
मंजुला शरण “मनु”
राँची झारखण्ड़।




