साहित्य

नशे को छोड़ो

सीता सर्वेश त्रिवेदी

नशा नाश करे तन का, नशा नाश करे मन का,

नशा छीन ले हर सुख, हर सपने, अपनों के,

 

एक प्याला क्या हाथ में आया, सब कुछ छिन जाता है,हँसता-खेलता घर-आँगन, पल भर में वीरान हो जाता हैं….

 

बच्चे राह निहारते हैं, कब पापा घर आएँगे,नई किताबें, नए बस्ते, शायद इस बार लाएँगे पर नशे में डूबा पिता,

सब वादे भूल जाता हैं।

 

बच्चों की मासूम आँखों में, बस आँसू छोड़ जाता है,कहा से आया नशा किसने बनाया हैं,लाखों घरों को बिन आग के जलाया हैं…..

 

फटी साड़ी में पत्नी, घर में काम करे दिन रात,कर्म नहीं भाग्य को दोष दे ,सहती रहती दिन रात वह कुछ नहीं कहती,अपने सारे दुःख छिपाकर, हर पीड़ा चुपचाप सहती।

 

माँ की आँखें नम रहतीं, पिता का सिर झुक जाता,जिस बेटा को नाजों से पाला,वह अभिमान गिराता, दर्द बहुत देता हैं,फिर भी उस मां बाप को देखो दुआ ही देती हैं….

 

नशे की आग इतनी भयानक, सबकुछ जलाकर रख देती है…

रिश्तों की मीठी डोर को, पल भर में तोड़ देती है…सब के सपने बिखेर देती हैं…

 

नशे का आदी इंसान, अपना ही संसार उजाड़ देता, अपने परिवार के माथे पर दुख का टीका लगा देता है।

कहीं जाए बीवी बच्चों को येपहचान दिलाता है उसी नशेड़ी के हैं बच्चे……

 

आओ आज यह प्रण करें,

नशे से रिश्ता तोड़ेंगे,अपने परिवार बच्चों की मुस्कानों से, जीवन को फिर जोड़ेंगे….

क्योंकि नशा नहीं,हैं कुछ

परिवार की खुशियाँ सबसे बड़ा धन हैं…

नशा छोड़कर ही हम, सच्चे अर्थों में मानव बन पायें ….

सीता सर्वेश त्रिवेदी जलालाबाद शाहजहांपुर

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