
आँगन में
किलकारी का,
गूंज रहा था
राग कहीं,
चिंताओं का
नाम न था,
मन पर कोई
दाग नहीं।
मिट्टी वाले
खेल हमारे,
हँसी बिखेरें
शाम-सवेरे,
कंचे, गिल्ली,
पतंग उड़ाना,
सपने लगते
कितने न्यारे।
काकाजी की
मीठी बातें,
दादी माँ की
प्यारी थाती,
किस्सों वाली
रात सुहानी,
मन में भरती
नई प्रभाती।
माँ के आँचल
की वो खुशबू,
बाबुल का
स्नेह अपार,
छोटी-छोटी
जिद पर मिलते,
ढेर दुलार
बारम्बार।
बरगद की
ठंडी छाया,
पीपल गाता
मधुर तराना,
सावन आते
झूले पड़ते,
मन लगता
बस मुस्काना।
स्कूलों की
वो घंटी प्यारी,
बस्ता लेकर
चलना रोज,
मित्रों संग
हँसते-गाते,
जीवन लगता
एक संयोग।
रूठना फिर
मान भी जाना,
क्षण भर में
सब भूल जाना,
निर्मल मन की
सच्ची दुनिया,
प्रेम ही प्रेम
बस लुटाना।
आज समय की
धूल तले,
छूट गई
वो राह सुहानी,
फिर भी दिल में
जीवित रहती,
बचपन वाली
मधुर कहानी।
हे ईश्वर!
ऐसा कर दो,
मन फिर से
निर्मल हो जाए,
बचपन जैसी
सरल हँसी से,
जीवन फिर
गाये मुस्काए।
— डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय




