
एक चिंगारी उठी, धुआँ भर गया,
सांसों का सौदा मौत सस्ती हो गई
सपनों का शहर, आंसुओं में ढल गया।
किताबों की खुशबू, राख में खो गई।
लखनऊ की फिजा, आज फिर रो गई,
सीढ़ियों पर थी भीड़, बाहर निकलने
को,कोई रास्ता न बचा, हाथ मचलने को।
“पापा, बचा लो!” की गूँजती पुकार,
चीर गई कलेजा, टूट गई दीवार,
बेसमेंट की लापरवाही, सिस्टम की मार।
उजड़ गए घर, मच गई हाहाकार,
आसमां भी रोया, देख मासूमों का
हाल,खुले हैं सवाल, जिम्मेदार
कौन इस बार?
सिस्टम की गड़बड़ी ने 15 छात्रों
को मार डाला! एक चिंगारी और
कई जिंदगियां उजाड़ गई,सांसों
का सौदा और मौत सस्ती हो गई।
स्वरचित एवं मौलिक ✍️
संगीता वर्मा,
कानपुर उत्तर प्रदेश




