
यह है मध्यप्रदेश के आदिवासी पिछड़े अंचल झाबुआ में जन्म हुआ डॉ रामशंकर चंचल जो आज सारे देश और विश्व में चर्चित हो चर्चा बन गए हैं
क्या आप जानते हैं इस महान साहित्य साधक के जीवन के सैकड़ों दर्द को, यूं ही कोई एकांत वास नहीं स्वीकार कर जीता है
यह है डॉ रामशंकर चंचल पहली शादी के दो साल बाद पत्नी राजेश्वरी त्रिवेदी जी स्वर्ग हो गया था एक मासूम बेहद सुंदर , खूब सूरत प्यारा सा बच्चा छोड़ कर पहली पत्नी चली गई थी 7 ,8 माह बच्चा रहा वह भी पीलिया रोग में चल बसा, दूसरी शादी 7साल बाद की
माता पिता की चाह थीं, ईश्वर कृपा से वह भी शालीन सुंदर छवि और पढ़ी लिखी बनस्थली महाविधालय जयपुर राजस्थान कोटा से थी, जीवन संघर्ष में दस्तक देती उसने हर पल डॉ रामशंकर चंचल का साथ दिया और जब जीवन में हर तरह से सुख सुकून आया तो वह चल बसी, अपने दो बेटे बेटी बहु ओर पोतों को छोड़ कर जैसे तैसे अद्भुत साहस जुटाया और डॉ रामशंकर चंचल ने बच्चों के लिए प्रेरणा स्रोत बन कर जीवन व्यतीत करते हुए कभी भी आंसू नहीं बहाए
मन भी होता तो एकांत में जाकर खूब रो लेते थे और फिर उनके जीवन में एक पवित्र पावन आत्मा लिए एक मित्र बन आयी जिसने उन्हें हर समय किसी मित्र की तरह अच्छे इंसान की तरह सदा ही ऊर्जा ताकत दी और उन्हें उनके दर्दों से कोसों दूर रखा जब डॉ रामशंकर चंचल पूर्ण रूप से ठीक महसूस कर जीने लगे तो उसे भी सुख सुकून मिला जैसे कोई पावन पवित्र आत्मा यही सोच जीवन में दस्तक देने आई हो, यह सब देख कर उसे भी अजीब सुख सुकून मिला और एक दिन अपने वादे के अनुसार जो दोनों के बीच तय था कोई विवशता थीं दोनों की छोड़ चल दी हमेशा के लिए अपने शहर में
बस इतना, जिसने डॉ रामशंकर चंचल को अद्भुत ज्ञान ताकत ऊर्जा और अजीब सृजन अद्भुत दी जिसे आज भी हर पल महसूस करते हुए सृजन शील डॉ रामशंकर चंचल ने सचमुच आज झाबुआ आदिवासी पिछड़े अंचल को सम्पूर्ण विश्व पटल पर दस्तक दे अमर कर दिया और सतत् आज भी लगे हुए सुख सुकून महसूस करते हैं और सोचते हैं शायद इसी कर्म के लिए उनका जन्म हुआ था वस कोई चाह नहीं कोई इच्छा नहीं अपनी फकीरी में मस्त है सृजन शील है
यह है डॉ रामशंकर चंचल जो माता पिता, दो पत्नियां बच्चा रूह जैसे सहज सरल पावन पवित्र आत्मा सब से दूर हो कर भी आज सदा ही सभी को अपने हर कदम में साथ महसूस करते हैं जीते है प्रसन्न हो अपने परिवार और समाज देश को कुछ और अच्छा दे सके यही सोच




