आजकल एक प्रचलन चला है बालकृष्ण का विग्रह लेकर चलना- सोचिए जिस औरत को वैवाहिक बंधन में बंधने के चालीस वर्ष के बाद भी अपने पति से प्रेम नहीं हुआ तो क्या वह कृष्ण से प्रेम कर लेगी?
प्रेम के नाम पर मात्र दिखावा चल रहा है और यही हाल भावना का है,भाव के नाम पर भी मात्र दिखावा ही चल रहा है,कैसे पता चलेगा किसी की क्या भावना है?
प्रेम और भावना शब्द दोनों अलग-अलग हैं,यदि वास्तविक प्रेम और भाव नहीं है तो देखी देखा नकल करना कदापि उचित नहीं।
यदि भगवान के बनाए हुए प्राणियों,जीव-जंतुओं,पेड़-पौधों के प्रति प्रेम और भाव नहीं,भगवान की कृपा और आदेश से प्राप्त हुए परिवार,आपस में पति-पत्नी,सास-ससुर,माता-पिता भाई-बहन आदि के प्रति प्रेम और भाव नहीं तो बंद करो ये विग्रह लेकर घूमना और दिखावा करना।
।। आचार्य धीरज “याज्ञिक” जी महाराज ।।




