
कटे आगोश में उसके वही शब चाँदनी देना
नहीं तो बस अमावस की मुझे तुम ज़िंदगी देना//
दिखाया इश्क़ का मंज़र तुम्हारा शुक्रिया रब्बा
तुम्हारे बाद अब मुझको उसी की बंदगी देना//
सदा रोशन रहे दुनिया सजे मुस्कान हर लब पर
दुखों की बस किसी को भी नहीं तुम तीरगी देना//
दुआओं में उठे हर हाथ की उम्मीद पूरी हो
ख़ुदा अपनी नवाज़िश से बशर हर को खुशी देना//
बहारों की रखो चाहत मगर पतझड़ भी आएगा
हवा ठंडी हो या तूफ़ान इक सी बानगी देना//
किसी के दर्द से इक हूक मेरे दिल में उठ जाए
ख़ुदा मेरे यही बस एक ख़ूबी आप सी देना//
बदन दो हैं भले अपने मगर इक रूह पाई है
उन्हीं से ज़िंदगी मुझको उन्हीं संग मौत भी देना//
स्वरचित ✍️ ✍️
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




