
भीड़ और तुम मैं
जब से तुम ने छोड़ा
फिर कभी तुम किसी में
दिखाई नहीं दी
सिवा मेरे अहसास के
कोई नहीं मिला इस
अथाह भीड़ में
जो बच्चें सा
तुम्हारी तरह दिल हो
मेरे प्रति बिना बोले
बेहिसाब आदर सम्मान हो
जो कभी भी कोई बोल कर
नहीं जाता पाया
साफ़ मन आत्मा हो
मानव मात्र के प्रति आदर
सम्मान हो
हां में जरूर सदा ही
मानव मात्र छोटे बड़े
सभी को प्रणाम करते
सुख सुकून पाता हूं
खैर जितना लिखा जाय
कम होगा
तुम , तुम थी
तुम कैसे कोई और
हो सकती हो
प्रणाम सत् सत् प्रणाम
आराध्य रूह
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




