
मैं चाहूँ तो इन वादियों को पलक में बसा लूँ,
मग़र अक़्स-ए-कुदरत को किस तर्ज़ पर मैं सजा लूँ?
ये बहती हुई नदियाँ,
ये चुप-चाप शजर,
इन सबकी ख़ामोशी को लफ्ज़ों में मैं कैसे ढालूँ?
है धूप का ये साया,
जो साए का है वज़ूद,
उस एक पल के अक़्स पर, कु़दरत को कैसे ढालूं?
बस एक नज़र ही काफ़ी है
रूह की दास्तान को,
फ़िर कागज़ के इन टुकड़ों पे क्या-क्या दलीलें मैं डालूँ?
कु़दरत तो तेरी ज़िन्दगी है निर्झरा,
अब किसी और का़यनात को
कैसे और क्यों क़ैद कर लूँ?
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।



