साहित्य

रिश्वतखोरी बंद हो, इसपर करे विचार।

*(भ्रष्टाचार)* दोहे
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मौका ऐसा ढूढ़ता, नाम मुंगेरी लाल।
काम वही करता सदा, जिससे आए माल।१।

सिस्टम का पैसा यहाँ, लूट सको तो लूट।
आपस में लड़ते रहें, ऐसी डालो फूट।२।

विषधर हैं कुछ देश में, उनका हो संहार।
कैसे जनता को ठगें, करते यही विचार।३।

रिश्वत ऐसे माँगते, जैसे हो व्यापार।
है कोई जो रोक ले, ऐसा भ्रष्टाचार।४।

आदत से मजबूर ये, रखते गन्दी सोच।
पैसे आये जेब में, खोले मीठा चोंच।५।

अपनी छाती पीटकर, खुश होते है लोग।
आज कमाई हो गयी, कल का करे वियोग।६।

विषधर हैं कुछ देश में, रखते खूब विकार।
मीठी वाणी बोलते, रखते गरल अपार।७।

जाल बिछाया आपने, पाला खुद ही रोग।
मुश्किल में जब पड़ गये, फिर दिखता परलोक।८।

पैसा भ्रष्टाचार का, फले नहीं हर बार।
दुःखियों के अभिशाप से, जल जाता घर-द्वार।९।

बना झोपड़ी को महल, दिखलाते ईमान।
जनता है सब जानती, इनके कर्म महान।१०।

रिश्वतखोरी हर जगह, इससे बचा न कोय।
बिन रिश्वत के आज भी, कोई काम न होय।११।

अपने अंदर झाँककर, सत्य बताना यार।
क्या तुम अपने कृत्य से, कर लोगे भव पार।१२।

ऐसे विषधर का यहांँ, सभी करें संहार।
रिश्वतखोरी बंद हो, इसपर करे विचार।१३।

डॉ. कृष्ण कान्त मिश्र
स्वरचित मौलिक
आजमगढ़ उ.प्र

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