साहित्य

कुण्डलिया में वर्षा रानी

डॉ मंजु गुप्ता

वर्षा रानी से डरा , सूरज का तप ताप।

क्रोधी लू भी डर गई , लखकर मेघ प्रताप ।।

लखकर मेघ प्रताप , उमस धरती से भागी ।

हुई सुखद बरसात ,धरा की किस्मत जागी ।।

हुआ कृषक को हर्ष , देख खेतों में पानी।

हुआ जगत खुशहाल , बरस के वर्षा रानी।।

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रानी बरखा बरस के , भरे धरा – तालाब ।

लाती सीमा तोड़ कर , दुनिया में सैलाब ।।

दुनिया में सैलाब , मुसीबत संकट लाए ।

बढ़ता नदी बहाब , जान आफत से जाए ।।

मचता हाहाकार , सड़क पर पानी – पानी ।

थमती है रफ्तार, सजा दे निसर्ग रानी ।।

डॉमंजु गुप्ता

वाशी , नवी मुंबई

 

मौसम बसंत प्रेम का,लाया रंग अनंत।

चटका डालन फाग है,पिक पुकारती कंत।।

पिक पुकारती कंत , मस्त महुआ है फूला ।

ऋतु ने बदले रंग,देख मन इसको झूला ।।

लिए रूप – रस – गंध , हुआ कुदरत का संगम ।

धरा — प्रकृति संबंध , निरख उन्मादित मौसम।।

 

 

सकल सृष्टि का रो रहा , आज सखी है प्यार ।

प्रकृति पेड़ ऋतु सब विकल, बहे अश्क़ की धार ।।

बहे अश्क़ की धार , दुखी हैं सारे परिजन।

करे हीर शृंगार , चली लाडो पति गृह – जन।।

कहती “मंजू” सत्य, जोड़ दो वंशों का कल।

लेय चली संस्कार ,निभा ने पतिधर्म सकल ।।डॉमंजु गुप्ता , वाशी नवी मुंबई

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