
वर्षा रानी से डरा , सूरज का तप ताप।
क्रोधी लू भी डर गई , लखकर मेघ प्रताप ।।
लखकर मेघ प्रताप , उमस धरती से भागी ।
हुई सुखद बरसात ,धरा की किस्मत जागी ।।
हुआ कृषक को हर्ष , देख खेतों में पानी।
हुआ जगत खुशहाल , बरस के वर्षा रानी।।
2
रानी बरखा बरस के , भरे धरा – तालाब ।
लाती सीमा तोड़ कर , दुनिया में सैलाब ।।
दुनिया में सैलाब , मुसीबत संकट लाए ।
बढ़ता नदी बहाब , जान आफत से जाए ।।
मचता हाहाकार , सड़क पर पानी – पानी ।
थमती है रफ्तार, सजा दे निसर्ग रानी ।।
डॉमंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई
मौसम बसंत प्रेम का,लाया रंग अनंत।
चटका डालन फाग है,पिक पुकारती कंत।।
पिक पुकारती कंत , मस्त महुआ है फूला ।
ऋतु ने बदले रंग,देख मन इसको झूला ।।
लिए रूप – रस – गंध , हुआ कुदरत का संगम ।
धरा — प्रकृति संबंध , निरख उन्मादित मौसम।।
सकल सृष्टि का रो रहा , आज सखी है प्यार ।
प्रकृति पेड़ ऋतु सब विकल, बहे अश्क़ की धार ।।
बहे अश्क़ की धार , दुखी हैं सारे परिजन।
करे हीर शृंगार , चली लाडो पति गृह – जन।।
कहती “मंजू” सत्य, जोड़ दो वंशों का कल।
लेय चली संस्कार ,निभा ने पतिधर्म सकल ।।डॉमंजु गुप्ता , वाशी नवी मुंबई



