
चहुॅं ओर है मच रहा ऑक्सीजन का हाहाकार
ये तो हुआ करता था क़ुदरत का मुफ़्त उपहार
क्यों बदला है वक़्त ?
तंगदिल प्रकृति हो गई
या कि अतिशय प्रकृति दोहन
आज की संस्कृति हो गई?
वृक्ष कटे, जंगल कटे, पर्वत कटे, नदियाॅं पटीं
पर्यावरण दूषित हुआ, ऑक्सीजन की मात्रा घटी
तरक्की पसंद मानवता आज, त्राहि त्राहि कर रही
ऑक्सीजन की कमी, ज़िंदगी पर भारी पड़ रही
पंचभूतों से बना ये तन, पंचभूत आधार हैं
क्षिति, जल, पावक, गगन ,समीर
इनसे ही यह संसार है।
अगर बची धरती तो ही, मानवता बच पाएगी
अब भी संभलो, धरती माता माफ़ तुम्हें कर जाएगी
पर्यावरण से जीवन है
पर्यावरण से सांसों की डोर
आओ स्वच्छ बनाएं पर्यावरण
आंख खुले तब ही है भोर।



