
छोटी बहन : आँगन की आख़िरी चिड़िया
भाग–5 : लौटी तो आँगन रो पड़ा
(मिलन, स्मृतियाँ और बाबुल का अंतिम आशीर्वाद)
वर्षों बाद वो दिन भी आया,
द्वारे एक सवारी थी।
सूनी चौखट खिल उठी फिर,
बिटिया घर की प्यारी थी।
माँ ने जैसे प्राण सँजोए,
दौड़ी बाहें फैलाकर।
बरसों की सारी पीड़ा रोई,
बेटी को सीने से लगाकर।
आँगन बोला, तुलसी हँसी,
महका फिर हर कोना था।
जैसे बिछड़ा सावन आकर,
फिर से घर का होना था।
दौड़ी बेटी बाबुल तक जब,
काँप रहे थे दोनों हाथ।
सूनी आँखों में भर आया,
बरसों का बिछुड़ा विश्वास।
कुछ न बोले बूढ़े बाबुल,
बस सिर पर हाथ धर दिया।
उस स्पर्श में जीवन भर का,
सारा आशीष उतर दिया।
चूम लिया फिर वही ललाट,
जिसको बचपन चूमा था।
वक्त खड़ा था मौन किनारे,
हर पल कितना सूना था।
चाँदी की वह थाली लाकर,
माँ ने फिर भोजन परोसा।
बाबुल का वह चाँदी का गिलास,
आज भी आँखों ने संजोया।
बेटी बोली—”बाबुल मेरे!
देर बहुत मैं कर बैठी।
कर्तव्यों की कठिन डगर में,
अपनी दुनिया भर बैठी।”
पिता मुस्काए धीमे स्वर में—
“बेटी! कोई दोष नहीं।
जिस घर को तुमने सींचा है,
उससे बड़ा संतोष नहीं।”
पर उस दिन के बाद न जाने,
किस्मत कैसी बाज़ी खेली।
कुछ ही दिन में बाबुल ने भी,
जीवन से विदा ले ली।
रोकर बोली सूनी चौखट—
“अब किसको मैं राह निहारूँ?”
आँगन बोला—”बेटी आती,
यादों के दीपक मैं वारूँ।”
सुनो जगत! यह बात अमर है,
समय कभी लौटेगा नहीं।
माँ-बाबुल का जीवित स्नेह,
फिर जीवन में मिलेगा नहीं।
‘दिव्य’ यही बस संदेश सुनाता,
रिश्तों को कल पर मत टालो।
जीते-जी माँ-बाबुल मिल लो,
बाद में केवल अश्रु संभालो।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल, उत्तर प्रदेश



