साहित्य

यह काम कर लो जी

संजीव हल्दिवी

दिल में दरारें न पड़ें
यह काम कर लो जी।

रहो मौजी सदा तुम
इक बात को समझो,
यह नजर का तीर है कातिल
इसे आंखों से ही समझो,
अगर दिल में उतारो तो
दिल से इसे स्वीकार कर लो जी।

इसे हर एक ने जाना
इसे हर एक ने माना,
यह सब की जरूरत है
मोहब्बत ही तिजारत है,
मिलें खुशियां हजारों आज
इसे मन से चलो निभा कर जी।

सितम करके सितमगर
यह हरगिज भूल जाता है,
वही हर मोड़ पर आकर
तुम्हें खुद ही रुलाता है,
ये दरारें नहीं अच्छी
इसे तुम याद कर लो जी।

पड़ी दरारें अगर तो
यह आइना तोड़ देती हैं ,
राह में पड़ें चट्टानें तो
निर्झर को मोड़ देती हैं,
बड़ी उलझन मिलेगी मोहब्बत में
यह दिल और कहता है ,
पाना अगर तुम को
तो इसका गौर कर लो जी।

दिल में दरारें न पड़ें
यह काम कर लो जी।

संजीव हल्दिवी
बरेली उत्तर प्रदेश
स्वरचित रचना

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