
मेरे ऊपर जो तेरी सरपरस्ती है,
जिन्दगी में इसी से छाई मस्ती है!
तेरा साया सुकूँ देता, मुहब्बत का,
वरना हर शै यहाँ हर्गिज न सस्ती है।
तेरी गलियों में बहता प्यार का दरिया,
है न पतवार लेकिन साथ किश्ती है।
तेरी छत पर परिंदे बैठ कर गाते,
आँख दीदार के खातिर तरसती है।
लोग कहने लगे हमको नजरबट्टु,
तेरी सोहबत से अच्छी तंदुरुस्ती है।
चाहिए कुछ नहीं हमको जमाने से,
तेरी रहमत से अपनी यार हस्ती है।
नागेंद्र नाथ गुप्ता, ठाणे (मुंबई)



