
अपना हिंदुस्तान कहलाता
आदि काल से कृषि-प्रधान देश,
कड़ी मेहनत जिसका आभूषण,
खेती ही किसान का सच्चा वेश।
भोर होते ही उठ जाते हैं,
हल-बैल संग खेतों की राह,
खेत जोतें, बीज बोते हैं,
दिनभर श्रम, नहीं कोई चाह।
सर्दी हो या तपती गर्मी,
बरसात भी रोके न कदम,
अपने कर्तव्य में रत रहकर,
करते हैं धरती को हरित-उपजम।
फसल पकने से पहले ही,
अनेक विपदाएँ घेर लेतीं,
अतिवृष्टि, अनावृष्टि से जूझकर,
आशा की लौ फिर भी जलती।
अपने श्रम से भरते हैं,
देश का अन्न भंडार महान,
भारत की अर्थव्यवस्था में,
किसान ही हैं देश की शान।
तेईस दिसंबर को जन्मे,
चरण सिंह—किसानों के मसीहा,
नई नीतियों से हित-संरक्षण,
दिखलाया उन्नति का सीहा।
उनकी जयंती के पावन दिन,
किसान दिवस मनाया जाता,
अन्नदाता के सम्मान में,
राष्ट्र नतमस्तक हो जाता।
डॉ. सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




