
माँ ( 1)
यदि, मेरा
ईश्वर से, साक्षात्कार होता
तो, माँ, मैं तेरे लिए
अमरत्व माँगता
और स्वयं के लिए,
ऐसी मृत्यु का वरदान
जो तेरे प्रति,
निष्ठा के बाधित होने
पर ही, प्राप्त हो
और यदि,
पुनः जन्म हो, इस धरती पर,
तो, आराधना,श्रद्धा और निष्ठा
के लिए,
तेरे ही चरणों
के आसपास रहूँ।
माँ (2)
तेरे,
पावन चेहरे के
दर्शन के सामने,
मक्का-मदीना, यरूशलेम के गिरजाघर, शैव और वैष्णव मंदिरों,सिख गुरुद्वारों और
अन्य सभी पूजा-स्थलों की
पवित्रता भी फ़ीकी है,
और तेरे दर्शन के
इन्हीं पावन पलों में,
मैं, जीना चाहता हूँ,
जन्म से जन्मान्तर तक।
माँ (3)
माँ,
तुम, जरा और व्याधि की
शर-शैया पर
लेटी हुई ‘भीष्म’ हो
बेटे-बेटियों, पौत्र-पौत्रियों को,
अपने-अपने जीवन में,
सुव्यवस्थित करना ही,
तुम्हारा ‘उत्तरायण’ है, माँ! ।
माँ (4)
जननी!
तुम, सबसे बढ़ कर हो
ऐसी होती तेरी ममता
कोई न कर सके,इस की समता;
तुम हो
दया, क्षमा और प्रेम की मूरत
तीन देवियों की
सम्मिलित सूरत,
मेरी प्रभु से
यही है हसरत
तेरे दर्शन में हो
मेरी जन्नत;
भूल से भी न हो
मुझसे तेरी अवमानना
मेरी प्रभु से है
बस यही मनोकामना
“मोक्ष नहीं चाहिए प्रभु!
सर्वदा रहे माँ की छत्रछाया। ”
माँ (5)
यदि तुम अमर होती माँ!
और तेरा कोई नराधम पुत्र
अमरत्व से अनजान
तेरे टुकड़े कर डालता
तब भी तेरा हर जीवंत टुकड़ा
यह पूछता उस बेटे से
“तेरे हाथ तो सकुशल है?
मुझे काटते वक़्त
उन्हें चोट तो नहीं लगी बेटा। ”
रविशंकर शुक्ल




