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अक्षर-ब्रह्म संकलन: शून्य से पूर्णता

धीरज कुमार शुक्ला'साखी'

भाग १: स्वर-साधना (दिव्य बीज)

अ से मिल अल्ताफ़ बना, आ से जो मिला आफ़ताब बना।
इ से मिलकर इनायत बनी, ई से ईश्वर की मैहर मिली।
उ से सुकून का उजाला बना, ऊ से ॐ सूफीयाना बना।
ऋ ने ऋत्वज बना ही दिया, ए से एकैक का बना सिलसिला।
ऐ से ऐजाद का हुआ है शिफा, ओ से ओजस ने बना है यहॉं।
औ की इबादत औरस‌‌ है कही, अं‌ से बनी‌ अंतस की जमीं।
अ: से विराम से श्वास जुड़ी।

भाग २: हृदय-कमल (क से घ)

क से मिल कंवल खिल गया, खोया जो ख खुदा मिल गया।
ग से जुड़ी गीतों की सदा, घ से घना अंधेरा मिटा।

भाग ३: परम सत्ता (च से झ)

च से चरम सत्ता मिली, छ से छनती आई हवा।
ज से ज़फ़र को लिख दिया, झ से झरोखा मिटा ही दिया।

भाग ४: कपाट-उद्घाटन (ट से ढ)

ट से टाल दी उसने विपदा सभी, ठ की ठसक जो मन में लगी।
ड से बना डर जब मिट गया, ढ से ढका था खुल गया।

भाग ५: तर्पण और शून्यता (त से न)

त के तर्पण ने तृप्त किया, थ की थकावट का अंत किया।
द से दयावंत का भाव दिया, ध‌ ने धम्म को धारण किया।
न से नगण्य मैं हो गया।

भाग ६: मजीदी उन्नति (प से म)

प ने पतित बन पावन किया, फ से फलसफा रूह का।
ब से मिली बरकत सभी, भ से भावों ने उन्नत किया।
म से मजीदी भाव जगा।

भाग ७: हकीकी सहर (य से ह)

य का यज्ञ अमर कर गया, र का रस भाव भर गया।
ल से लोहित मन हो गया, व से वफायत मैं बन गया।
श से शमर जो लिख दिया, स सहर से मिल ही गया।
ह से हकीकी भाल बन गया।

भाग ८: महा-मिलन (क्ष से ज्ञ)

क्ष की क्षमा ने क्षय कर दिया, त्र से त्रिवेणी संगम बन गया।
ज्ञ का ज्ञान साखी बन गया, बन‌ स्वामिनी मुझे मिल गया।

कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’साखी’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,
जिला-झालावाड़ ,राजस्थान (३२६०३८)

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