
क्या क़िस्मत लेकर आएं हैं,
जी तोड़ परिश्रम करते हैं,
जिस दिन काम नहीं मिले,
भूखे ही सो जाते हैं।
घर में कोई बीमार हुआ,
डॉक्टर को दिखाने जाते हैं,
रोजी की छुट्टी हो जाती,
पथ्य-दवा तो आनी ही है,
खुद तो केवल पानी पीकर,
भूखे ही सो जाते हैं।
जो माता बीमार हुई तो,
बालक काम पर जाता है,
माँ का इलाज कराने को,
खुद भूखा सो जाता है।
चोरी-बेईमानी न भाती,
पढ़ने की बारी न आती,
खेल-खिलौने नसीब न होते,
रोटी भी बँट जाती है।
बचपन में समझदार हो जाते,
जो बाप का सरमाया न होता,
रूखा-सूखा खाकर, माँ से लिपट कर,
कितनी रातें भूखे ही सो जाते हैं।
गरीबी की तो यही कहानी,
दर-दर देखी जाती है,
कोशिश कितनी भी कर लें,
कुपोषित ही रह जाते हैं,
दिन कांटे,मन मारें फिर भी,
मज़बूरी में भूखे ही सो जाते हैं।
भूखे ही सो जाते हैं।।
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।।




